Monday, January 26, 2015

मुरली 26 जनवरी 2015

“मीठे बच्चे - तुम भारत के मोस्ट वैल्युबुल सर्वेंट हो, तुम्हें अपने तन-मन-धन से श्रीमत पर इसे रामराज्य बनाना है”    प्रश्न:-    सच्ची अलौकिक सेवा कौन-सी है, जो अभी तुम बच्चे करते हो? उत्तर:- तुम बच्चे गुप्त रीति से श्रीमत पर पावन भूमि सुखधाम की स्थापना कर रहे हो - यही भारत की सच्ची अलौकिक सेवा है । तुम बेहद बाप की श्रीमत पर सबको रावण की जेल से छुड़ा रहे हो । इसके लिए तुम पावन बनकर दूसरों को पावन बनाते हो । गीत:- नयन हीन को राह दिखाओ..  धारणा के लिए मुख्य सार:- 1. जैसे हाइएस्ट बापदादा सिम्पुल रहते हैं ऐसे बहुत-बहुत सिम्पुल, निराकारी और निरहंकारी बनकर रहना है । बाप द्वारा जो फर्स्टक्लास ज्ञान मिला है, उसका चिंतन करना है । 2. ड्रामा जो हूबहू रिपीट हो रहा है, इसमें बेहद का पुरुषार्थ कर बेहद सुख की प्राप्ति करनी है । कभी ड्रामा कहकर रुक नहीं जाना है । प्रालब्ध के लिए पुरुषार्थ जरूर करना है । वरदान:- कर्मों की गति को जान गति-सद्गति का फैंसला करने वाले मास्टर दुःख हर्ता सुख कर्ता भव !    अभी तक अपने जीवन की कहानी देखने और सुनाने में बिजी नहीं रहो । बल्कि हर एक के कर्म की गति को जान गति सद्गति देने के फैंसले करो । मास्टर दुख हर्ता सुख कर्ता का पार्ट बजाओ । अपनी रचना के दुख अशान्ति की समस्या को समाप्त करो, उन्हें महादान और वरदान दो । खुद फैसल्टीज़ (सुविधायें) न लो, अब तो दाता बनकर दो । यदि सैलवेशन के आधार पर स्वयं की उन्नति वा सेवा में अल्पकाल के लिए सफलता प्राप्त हो भी जाये तो भी आज महान होंगे कल महानता की प्यासी आत्मा बन जायेंगे । स्लोगन:-  अनुभूति न होना-युद्ध की स्टेज है, योगी बनो योद्धे नहीं ।      अव्यक्त स्थिति का अनुभव करने के लिए विशेष होमवर्क चलते-फिरते अपने को निराकारी आत्मा और कर्म करते अव्यक्त फरिश्ता समझो तो साक्षी दृष्टा बन जायेंगे। इस देह की दुनिया में कुछ भी होता रहे, लेकिन फरिश्ता ऊपर से साक्षी हो सब पार्ट देखते, सकाश अर्थात् सहयोग देता है । सकाश देना ही निभाना है।   ओम् शांति |

Sunday, January 25, 2015

Murli 26 JANUARY 2015

Essence: Sweet children, you are the most valuable servants of Bharat. On the basis of shrimat you use your bodies, minds and wealth to make it into the kingdom of Rama.    Question: What is true spiritual service, which you children are now doing? Answer: By following shrimat, you children are establishing the pure land of happiness in an incognito way. This is the true spiritual service of Bharat. By following the unlimited Father’s shrimat, you are liberating everyone from Ravan’s jail. For this, you are becoming pure and making others pure. Song: Show the path to the blind, o God!  Essence for Dharna: 1. Just as the highest BapDada is simple, you have to become very simple, incorporeal and egoless in the same way. Churn this first-class knowledge that you receive from the Father. 2. In order to attain unlimited happiness in this drama which repeats identically, make unlimited effort. Do not stop making effort or leave everything to the drama. You definitely have to make effort for your reward. Blessing: May you be a master remover of sorrow and a bestower of happiness who decides to grant salvation by knowing the philosophy of karma.    Do not remain busy in watching or listening to your own story until now, but by knowing the philosophy of everyone’s actions, decide to grant salvation. Play the part of a master remover of sorrow and a bestower of happiness. Finish any problems of sorrow and peacelessness of your own creation; give them the great donation and blessings. Do not take the facilities yourself, but now be a bestower and give. Even if you do make self-progress or achieve some temporary success in service on the basis of this salvation, today you may be great but you would thirst for that greatness tomorrow. Slogan: Not to have an experience is a stage of battling; become yogis not warriors.      Special homework to experience the avyakt stage in this avyakt month Consider yourself to be an incorporeal soul as you walk, move around and while performing actions, consider yourself to be an avyakt angel and you will become a detached observer. No matter what happens in the physical world, an angel becomes a detached observer and watches the part from up above and gives sakaash, that is, co-operation. To give sakaash means to fulfil your responsibility. Om shanti

Saturday, January 24, 2015

मुरली 25 जनवरी 2015

सम्मान देना ही सम्मान लेना है
आज भाग्यविधाता बाप सर्व भाग्यशाली बच्चों का विशेष एक बात का आदि से अब तक का रिकार्ड (लेखा) देख रहे थे । कौन सी बात कारिगार्ड (सम्मान) का रिकार्ड देख रहे थे । रिगार्ड भी विशेष ब्राह्मण जीवन के चढ़ती कला का साधन है । जो रिगार्ड देते हैं वही विशेष आत्मा वर्तमान समय और जन्म-जन्मान्तर भी अन्य आत्माओं द्वारा रिगार्ड लेने के पात्र बनते हैं । बापदादा भी साकार सृष्टि पर पार्ट बजाते आदि काल से पहले बच्चों को रिगार्ड दिया । बच्चों को स्वयं से भी श्रेष्ठ मानकर बच्चों के आगे समर्पण हुआ । पहले बच्चे पीछे बापबच्चे सिर के ताज बनतेबच्चे ही डबल पूज्य बनतेबच्चे ही बाप को प्रत्यक्ष करने के निमित्त बनते हैं । बाप ने भी आदिकाल से रिगार्ड रखा - ऐसे ही फालो फादर करने वाले बच्चे आदिकाल से अपना रिगार्ड का रिकार्ड बहुत अच्छा रखते आये हैं । हरेक अपने आपको चेक करो कि हमारा रिकार्ड अब तक कैसा रहा ।
रिकार्ड रखने के लिए पहली बात है - बाप में रिगार्ड - दूसरी बात..... बाप द्वारा मिली हुई नॉलेज का रिगार्ड - तीसरी बात - स्वयं का रिगार्ड - चौथी बात - जो भी आत्माएं चाहे ब्राह्मण परिवार वा अन्य आत्माएं जो भी सम्पर्क में आती हैं उन आत्माओं के प्रति आत्मा का रिगार्ड । इन चारों ही बातों में अपने आपको चेक करो कि हमारा रिकार्ड कैसा रहाचारों ही बातों में कितनी मार्क्स हैंचारों ही बातों में सम्पन्न रहे हैं वा यथा शक्ति किस बात में मार्क्स अच्छी है और किसमें कम?
पहली बात - बाप का रिगार्ड अर्थात् सदा जो है जैसा है वैसे स्वरूप सेयथार्थ पहचान से बाप के साथ सर्व सम्बन्धों की मर्यादाओं को निभाना । बाप के सम्बन्ध का रिगार्ड है फालो फादर करना । शिक्षक के सम्बन्ध का रिगार्ड है सदा पढ़ाई में रेगुलर (सदा) और पंचुअल (समय पर) रहना । पढ़ाई की सर्व सबजेक्ट में फुल अटेंशन देना - सतगुरू के सम्बन्ध में रिगार्ड रखना - अर्थात् सतगुरू की आज्ञा देह सहित देह के सर्व सम्बन्ध भूलकर देही स्वरूप अर्थात् सतगुरू के समान निराकारी स्थिति में स्थित रहना । सदा वापस घर जाने के लिए एवररेडी रहना । ऐसे ही साजन के सम्बन्ध का रिगार्ड - हर संकल्प और सेकेण्ड में उसी एक की लगन में आशिक रहना । तुम्हीं से खाऊंतुम्हीं से हर कार्य में सदा संग रहूँ..... इस वफादारी को निभाना । सखा वा बन्दु के सम्बन्ध का रिगार्ड अर्थात् सदा अपना सर्व बातों में साथीपन का अनुभव करना । ऐसे सर्व सम्बन्धों का नाता निभाना ही रिगार्ड रखना है । रिगार्ड रखना अर्थात् जैसे कहावत है एक बाप दूसरा न कोई - बाप ने कहा और बच्चे ने किया । कदम के ऊपर कदम रख चलना । मनमत वा परमत बुद्धि द्वारा ऐसे समाप्त हो जाए जैसे कोई चीज होती ही नहीं । मनमत वा परमत को संकल्प से टच करना भी स्वप्नमात्र भी न हो अर्थात् अविद्या हो । सिर्फ एक ही श्रीमत बुद्धि में हो - सुनो तो भी बाप सेबोलो तो भी बाप कादेखो तो भी बाप कोचलो तो भी बाप के साथसोचो तो भी बाप की बातें सोचोकरो तो भी बाप के सुनाये हुए श्रेष्ठ कर्म करो । इसको कहा जाता है बाप के रिगार्ड का रिकार्ड । ऐसे चेक करो कि पहली बात में रिकार्ड फर्स्टक्लास रहा है वा सेकेण्ड क्लासअखण्ड रहा है वा खण्डित हुआ हैअटल रहा है या माया की परिस्थितियों प्रमाण रिगार्ड का रिकार्ड हलचल में रहा हैलकीर सदा सीधी रही है वा टेढ़ी बाँकी भी रही है?
दूसरी बात - नॉलेज का रिगार्ड अर्थात् आदि से अभी तक जो भी महावाक्य उच्चारण हुए उन हर महावाक्य में अटल निश्चय हो - कैसे होगाकब होगाहोना तो चाहिएहै तो सत्य इस प्रकार के क्वेश्चन उठाना भी अर्थात् सूक्ष्म संकल्प के रूप में संशय उठाना है । यह भी नॉलेज का डिसरिगार्ड है ।
आजकल के अल्पकाल के चमत्कार दिखाने वाले अर्थात् बाप से वंचित करने वाले यथार्थ से दूर करने वाले नामधारी महान आत्मायें उन्हों के लिए भी सत-वचन महाराज कहते हैं । तो सतगुरू जो महान आत्माओं का भी रचयिता परमपिता है उसकी सत्य नॉलेज में क्वेश्चन करना वा संकल्प उठानायह भी रॉयल रूप का संशय अर्थात् डिसरिगार्ड है । एक क्वेश्चन होता है स्पष्ट करने के लिएदूसरा क्वेश्चन होता है सूक्ष्म संशय के आधार सेइसको कहा जाता है डिसरिगार्ड । बाप तो ऐसे कहते हैं लेकिन होना असम्भव है वा मुश्किल हैऐसा संकल्प भी किस खाते में जायेगायह चेक करो ।
तीसरी बात - स्वयं का रिगार्ड - इसमें भी बाप द्वारा इस अलौकिक श्रेष्ठ जीवन वा ब्राह्मण जीवन के जो भी टाइटिल है वा अनेक गुणों और कर्तव्य के आधार पर जो स्वरूप वा स्थिति का गायन है - जैसे स्वदर्शन चक्रधारीज्ञान स्वरूपप्रेम स्वरूपफरिश्तेपन की स्थिति । जो बाप ने नॉलेज के आधार पर टाइटिल दिये हैं ऐसे अपने को अनुभव करना वा ऐसी स्थिति में स्थित रहना । जो हूँ वैसा अपने को समझकर चलना । जो हूँ अर्थात् श्रेष्ठ आत्मा हूँडायरेक्ट बाप की सन्तान हूँबेहद के प्रापर्टी की अधिकारी हूँमास्टर सर्वशक्तिमान हूँ ऐसे जो हूँ वैसे समझकर चलना इसको कहा जाता हैं स्वयं का रिगार्ड । मैं तो कमजोर हूँमेरी हिम्मत नहीं है । बाप कहते हैं लेकिन मैं नहीं बन सकतीमेरा ड्रामा में पार्ट ही पीछे का हैजितना है उतना ही अच्छा हैऐसे स्वयं से दिलशिकस्त होते यह भी स्वयं का डिसरिगार्ड है । यह भी चेक करो कि स्वयं के रिगार्ड का रिकार्ड क्या रहा?
चौथी बात - आत्माओं द्वारा सम्बन्ध वा सम्पर्क वाली आत्माओं का रिगार्ड - इसका अर्थ है हर आत्मा को चाहे ब्राह्मण आत्माचाहे अज्ञानी आत्मा हो लेकिन हर आत्मा के प्रति श्रेष्ठ भावना अर्थात् ऊंचा उठाने की वा आगे बढ़ाने की भावना हो,विश्व कल्याण की कामना हो इसी धारणा से हर आत्मा से सम्पर्क में आना - यह है रिगार्ड रखना । सदा आत्मा के गुणों वा विशेषताओं को देखनाअवगुण को देखते हुए न देखना वा उससे भी ऊँचा अपनी शुभ वृत्ति से वा शुभचिन्तक स्थिति से अन्य के अवगुण को भी परिवर्तन करना - इसको कहा जाता है आत्मा का आत्मा प्रति रिगार्ड । सदा अपने स्मृति की समर्थी द्वारा अन्य आत्माओं का सहयोगी बनना - यह है रिगार्ड । सदा 'पहले आपका मंत्र संकल्प और कर्म में लाना,किसी की भी कमजोरी वा अवगुण को अपनी कमजोरी वा अवगुण समझ वर्णन करने के बजाए वा फैलाने के बजाए समाना और परिवर्तन करना - यह है रिगार्ड । किसी की भी कमजोरी की बड़ी बात को छोटा करनापहाड़ को राई बनाना चाहिए न कि राई को पहाड़ बनाना है - इसको कहा जाता है रिगार्ड । दिलशिकस्त को शक्तिवान बनानासंग के रंग में नहीं आना,सदा उमंग-उल्लास में लाना इसको कहा जाता है रिगार्ड । ऐसे इस चौथी बात में भी चेक करो कि इसमें भी कितनी मार्क्स हैंसमझा कैसे रिगार्ड देना है । ऐसे चारों ही बातों में रिगार्ड अच्छा रखने वाले विश्व की आत्माओं द्वारा रिगार्ड लेने के पात्र बनते हैं अर्थात् अब विश्व कल्याणकारी रूप में और भविष्य विश्व महाराजन के रूप में और मध्य में श्रेष्ठ पूज्य के रूप में प्रसिद्ध होते हैं । तो विश्व महाराजन बनने के लिए रिकार्ड भी ऐसा बनाओ ।
रिगार्ड रखना अर्थात् रिगार्ड लेना है । देनालेना हो जाता है । एक देना और दस पाना है । सहज हुआ ना ।
कर्नाटक वाले सदा बाप के स्नेहमूर्त रहते हैं । कर्नाटक की धरनी बहुत सहज है । भावना के कारण धरनी फलीभूत है,इसलिए वृद्धि बहुत होती है । कर्नाटक की धरनी को सहज संदेश मिलने का ड्रामा अनुसार वरदान है । विशेष आत्माएं भी इस धरनी से सहज निकल सकती हैं । लेकिन अभी आगे क्या करना है! जो वृद्धि होती है उसको विधिपूर्वक चलाना । सर्वशक्तियों के आधार से पालना में सदा महावीर बनना है । स्नेह और शक्ति का बैलेन्स रखना यह विशेषता लानी है । वैसे भोलानाथ बाप के भोले बच्चे अच्छे हैं । परवाने अच्छे हैं । बापदादा को पसन्द हैं । अभी बाप-पसन्द के साथ लोक पसन्द भी बनना है । अच्छा
ऐसे सदा बाप को फालो करने वालेआज्ञाकारीवफादारफरमानवरदारसदा महादानी वरदानी अर्थात  विश्व कल्याणकारी,हर आत्मा को रिगार्ड दे आगे बढ़ाने वालेसदा शुभचिन्तक आत्माओं को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते । ओम शान्ति ।
पार्टियों से मुलाकात: -
1) सभी अपने को होलीहंस समझते हो? होलीहंस अर्थात् जो सदा व्यर्थ को छोड़ समर्थ को अपनाने वाले हों । वह हंस क्षीर और नीर को अलग- अलग करता है लेकिन होलीहंस व्यर्थ और समर्थ अलग कर व्यर्थ को छोड़ देंगेसमर्थ को अपनायेंगे । जैसे हंस कभी भी कंकड़ नहीं चुगेंगेरत्न को धारण करेंगेऐसे होलीहंस जो सदा बाप के गुणों को धारण करेंकिसी के भी अवगुण अर्थात् कंकड़ को धारण न करें उसको कहा जाता है होलीहंस अर्थात् पवित्र आत्मायेंशुद्ध आत्मायें । जैसा शुद्ध आत्मा होगा वैसा उसका आहार व्यवहार भी शुद्ध होगाहोली हंस का आहार भी शुद्धव्यवहार भी शुद्ध । अशुद्धि खत्म हो जाती है क्योंकि शुद्ध दुनिया में जा रहे हैं । जहाँ अपवित्रता वा अशुद्धि का नामनिशान भी नहीं । अब होलीहंस बनते हो तब ही भविष्य में भी हिज़ होलीनेस कहलाते हो । कभी गलती से भी किसका अवगुण धारण न करने वालेसदा गले में गुण माला हो । शक्तियों के गले में भी माला दिखाते हैंदेवताओं के गले में भी माला दिखाते हैं । तो संगम में गुणों की माला धारण करने वालों की यादगार में माला दिखाई है । बाप के गुणों को धारण करते हुए सर्व के गुण देखने वाले हो तो यह गुणमाला सभी के गले में पड़ी हैगुणमाला धारण करने वाले ही विजय माला में आते हैं । तो चेक करना चाहिए माला छोटी है या बड़ी हैजितने बाप के और सर्व के गुण स्वयं में धारण करने वाले हैं वही बड़ी माला धारण करने वाले हैं । गुणमाला को सुमिरण करने से स्वयं भी गुणमूर्त बन जाते हैं । जैसे बाप गुणमूर्त हैं वैसे बच्चे भी सदा गुणमूर्त हैं ।
2) सदा कमल पुष्प के समान प्रवृत्ति में रहते हर कार्य करते हुए न्यारे अर्थात् बाप के प्यारे समझते हो? जितना न्यारा होगा उसके न्यारे पन की निशानी होगी - बाप का प्यारा होगा । बाप के प्यारे कहाँ तक बने हैंप्यारे की निशानी क्या है?जिससे प्यार होता है उसकी याद स्वत : रहती है । याद करना नहीं पड़ता । अगर ऐसा अनुभव होता तो समझो प्यारे हैं । प्यार की निशानी स्वत : यादअगर मेहनत करनी पड़ती है तो कम प्यार है । जहॉ जाये वहाँ बाप और बच्चे का मिलन मेला ही होजैसे कम्बाइन्ड होते हैं तो कभी एक दो से अलग नहीं हो सकतेऐसे अपने को कम्बाइन्ड अनुभव करो । जहाँ जायें वहाँ बाप ही बापइसको कहा जाता है निरन्तर योगी । बाप की याद मुश्किल न हो बाप को भूलना मुश्किल हो । जैसे आधाकल्प करना मुश्किल था वैसे अब संगम पर भूलना मुश्किल होकोई कितना भी भुलाने की कोशिश करे लेकिन अभुल । ऐसे पक्के अंगद के समानसंकल्प रूपी नाखून भी माया हिला न सके - ऐसे ही बाप के अति प्यारे हैं ।
3) सर्विस में कोई न कोई प्रकार का विघ्न वा टेंशन आने का कारण है - स्वयं और सेवा का बैलेन्स नहींस्वयं का अटेंशन कम हो जाने के कारण सर्विस में भी कोई न कोई प्रकार का विघ्न वा टेंशन पैदा हो जाता है । सर्विस के प्लैन के साथ पहले अपना प्लैन बनाओ । मर्यादाओं के लकीर के अन्दर रहते हुए सर्विस करो । लकीर से बाहर निकल सर्विस करेंगे तो सफलता नहीं मिल सकती । पहले अपनी धारणा की कमेटी बनाओ । आपस में प्लैन बनाओ फिर सर्विस वृद्धि को सहज पा लेगी ।
4) सदा अपने को शमा के ऊपर फिदा होने वाले परवाने समझते हो? परवाने को सिवाए शमा के और कुछ सूझता नहीं । जैसे परवाना स्वयं को मिटाकर शमा में समा जाता है वैसे अपने देहभान को भूल बाप समान बन जाना इसको कहा जाता है समान बनना अर्थात् समा जाना । सारा कल्प तो बीत चुका, अब संगम को वरदान है जो बनने चाहो वह बन सकते हो । भाग्यविधाता भाग्य की लकीर अभी ही खींचते हैंजो चाहो वह भाग्य बनाओ । अच्छा - ओम शान्ति ।

वरदान:- नाम और मान के त्याग द्वारा सर्व का प्यार प्राप्त करने वाले विश्व के भाग्य विधाता भव !
जैसे बाप को नाम रूप से न्यारा कहते हैं लेकिन सबसे अधिक नाम का गायन बाप का हैवैसे ही आप भी अल्पकाल के नाम और मान से न्यारे बनो तो सदाकाल के लिए सर्व के प्यारे स्वत : बन जायेंगे । जो नाम-मान के भिखारीपन का त्याग करते हैं वह विश्व के भाग्य विधाता बन जाते हैं । कर्म का फल तो स्वत : आपके सामने सम्पन्न स्वरूप में आयेगा इसलिए अल्पकाल की इच्छा मात्रम अविद्या बनो । कच्चा फल नहीं खाओउसका त्याग करो तो भाग्य आपके पीछे आयेगा ।
स्लोगन:-  परमात्म बाप के बच्चे हो तो बुद्धि रूपी पांव सदा तख्तनशीन हो ।

Murli 25 JANUARY 2015

“To give regard (sammaan) is to receive regard.”

Giving becomes a form of receiving.

Those who give regard will be known as world benefactors now, and in the future, they will be the world emperors and in the middle period they will be the elevated and worthy of worship souls. In order to become a world emperor, you have to create a record of regard in all relationships with Shiv Baba and in all four subjects.

Regard in Relationships with Shiv Baba: to fulfill all relationships is to have regard for your relationship with Him.
1.   To have regard for the Father means to know and recognize Him accurately as He is and to fulfill the code of conduct in all your relationships with that accurate recognition. To have regard for the relationship of the Father is to follow the Father.
2.   To have regard for the relationship of the Teacher is to be regular and punctual in your study and to pay full attention to all the subjects you are studying.
3.   To have regard for the relationship of the Satguru means to follow His instruction to forget your body and all your bodily relations. It means to become soul conscious and to stabilize yourself in the incorporeal stage, the same as the Satguru. It means to remain constantly ever ready to return home.
4.   To have regard for the relationship of the Bridegroom means to remain lost in love for that One in every thought at every second and to fulfill your faithfulness in everything you do: “I eat with You, I do everything with You.”
5.   To have regard for the relationship of the Friend is constantly to experience His companionship in whatever you do.
First Subject: To have regard for the Father means:
1.   “Mine is the one Father and none other.”
2.   The Father says something and the children put it into practice; they step constantly in the Father’s steps.
3.   The dictates of your own mind and the dictates of others should be removed from your intellect to such an extent that it seems as though they never existed. The dictates of your own mind and the dictates of others shouldn’t touch your thoughts even in your dreams; you should be totally ignorant of them.
4.   Only the shrimat of the One should be in your intellect. Only listen to the one Father, only speak of the things that the one Father has told you, only see the one Father, only walk with the Father, only think of the things that the Father has told you and only perform the elevated deeds that the Father has told you to perform. This is called maintaining your record of having regard for the Father.
Second Subject: To have regard for this knowledge means:
1.    To have unshakeable faith in all the elevated versions that have been spoken from the beginning to the present time.
2.   To raise questions or to doubt any of the knowledge given by the Satguru, who is the Supreme Father, the Creator of all the great souls, is also a royal form of doubt or disregard. It is one thing to ask questions for clarification, but another thing to ask questions based on subtle doubts. This is known as having disregard.

Third Subject: To have regard for the self means:
1.   To experience stability in the stage of whatever titles you have received from the Father in this alokik elevated spiritual life, in this Brahmin life. It is also the praise of your form and stage based on your virtues and tasks, such as being a spinner of the discus of self-realization, an embodiment of knowledge, an embodiment of love and of having an angelic stage. Experience yourself according to the titles that the Father has given you on the basis of knowledge and stabilize yourself in that stage. You have to conduct yourself knowing who you are. “What I am means I am an elevated soul. I am a direct child of the Father. I have a right to His unlimited property. I am a master almighty authority.”
2.   To continue to interact with others, knowing yourself as you are, is known as having regard for yourself. “I am weak! I have no courage! The Father says this, but I cannot become this. My part in the drama is to come later. I’ll be happy with whatever I receive.” To feel hopeless in this way is to have disregard for yourself.
Fourth Subject: To have regard for souls who come into relationship or contact with you means:
1.   To have elevated feelings for all souls, whether they are Brahmin souls or souls who don’t have this knowledge.
2.   You should have the elevated feeling of wanting to uplift them, to make them move forward and to benefit everyone in the world. To interact with all souls by adopting this virtue means to have regard for everyone.
3.   Constantly look at the virtues and specialties of all souls. Look at them, but don’t see their defects. Or, even higher than that, with your positive attitude and your stage of having positive thoughts for all, to transform the defects of many others is known as the soul having regard for souls.
4.   To co-operate with all souls with the power of your awareness is to have regard.
5.   Constantly to have the regard of “You first” in your thoughts and deeds and to consider the weaknesses or defects of others to be your own and, instead of telling others about them and spreading them around, to accommodate them and transform them is to have regard. You should reduce someone’s big weakness; reduce it from a mountain into a mustard seed instead of making a mountain out of a mustard seed: this is known as having regard.
6.   To make hopeless souls powerful - not to be coloured by their company but constantly to give them zeal and enthusiasm is known as having regard.
Blessing: May you become a bestower of fortune (bhaagya vidhaata) for the world who receives love from everyone through your renunciation of name and respect (naam aur maan).

Just as the Father is said to be beyond name and form, and yet the name that is praised the most is the Father’s, similarly, you too have to become detached from having temporary name and respect and you will then automatically be loved by all for all time. Those who renounce being beggars for name and respect become bestowers of fortune for the world. The fruit of your karma will automatically come in front of you in its complete form. Therefore, be ignorant of the desire of anything temporary. Do not eat raw fruit: renounce that and fortune will follow you.

Slogan: You are a child of God, the Father, and so the feet of your intellect should always be on the throne.

Murli 24 JANUARY 2015

Essence: Sweet children, keep a chart of remembrance. The more you imbibe the habit of staying in remembrance, the more your sins will be cut away and the closer you will come to your karmateet stage.    Question: Which four things can indicate whether you have written an accurate chart or not? Answer: 1) Your personality 2) Your behaviour 3) Your service 4) Your happiness. From looking at these four aspects, BapDada can tell whether you are writing your chart accurately or not. The chart of the children, who do service in museums and exhibitions, those whose behaviour is royal and who experience limitless happiness, will definitely be good. Song: O man, see your face in the mirror of your heart. Essence for Dharna: 1. Look at your own chart and check yourself: How much charity have I accumulated? To what extent has the soul become satopradhan? Settle all your accounts by staying in remembrance. 2. In order to claim a scholarship, become serviceable and benefit many and be loved by the Father. Become a teacher and show the path to many others. Blessing: May you be altruistic and merciful and free every soul from wandering and begging.    Many souls become aware in a second of their spiritual form and the destination of the spirit through the merciful thoughts of the children who are altruistic and merciful. From those thoughts of mercy, beggar souls will be able to see a glimpse of all the treasures, and wandering souls will see in front of them the shores and the destination of liberation and liberation-in-life. You will play the parts of removers of sorrow and bestowers of happiness for all and will always have a method or means like a magic key of making unhappy souls happy. Slogan: Be a server and do altruistic service and you will definitely receive the fruit of service.      Special homework to experience the avyakt stage in this avyakt month   You are spiritual, royal souls and you must, therefore, never let wasteful or ordinary words emerge from your lips. Let every word be yuktiyukt and be beyond gross intentions and filled with avyakt intentions and you will then be able to enter the royal family. Om shanti

Friday, January 23, 2015

मुरली 24 जनवरी 2015

“मीठे बच्चे - याद का चार्ट रखो, जितना-जितना याद में रहने की आदत पड़ती जायेगी उतना पाप कटते जायेंगे, कर्मातीत अवस्था समीप आती जायेगी”    प्रश्न:-    चार्ट ठीक है वा नहीं, इसकी परख किन 4 बातों से की जाती है? उत्तर:- 1-आसामी, 2-चलन, 3-सर्विस और 4-खुशी । बापदादा इन चार बातों को देखकर बताते हैं कि इनका चार्ट ठीक है या नहीं? जो बच्चे म्युजियम या प्रदर्शनी की सर्विस पर रहते, जिनकी चलन रॉयल है, अपार खुशी में रहते हैं, तो जरूर उनका चार्ट ठीक होगा । गीत:- मुखड़ा देख ले प्राणी.. धारणा के लिए मुख्य सार:- 1. अपने चार्ट को देखते जाँच करनी है कि कितने पुण्य जमा है? आत्मा सतोप्रधान कितनी बनी है? याद में रहकर सब हिसाब-किताब चुक्तू करने हैं । 2. स्कॉलरशिप लेने के लिए सर्विसएबुल बन बहुतों का कल्याण करना है । बाप का प्रिय बनना है । टीचर बन बहुतों को रास्ता बताना है । वरदान:- हर आत्मा को भटकने या भिखारीपन से बचाने वाले निष्काम रहमदिल भव !    जो बच्चे निष्काम रहमदिल हैं उनके रहम के संकल्प से अन्य आत्माओं को अपने रूहानी रूप वा रूह की मंजिल सेकण्ड में स्मृति में आ जायेगी । उनके रहम के संकल्प से भिखारी को सर्व खजानों की झलक दिखाई देगी । भटकती हुई आत्माओं को मुक्ति वा जीवनमुक्ति का किनारा व मंजिल सामने दिखाई देगी । वे सर्व के दुख हर्ता सुख कर्ता का पार्ट बजायेंगे, दुखी को सुखी करने की युक्ति व साधन सदा उनके पास जादू की चाबी के माफिक होगा । स्लोगन:-  सेवाधारी बन निःस्वार्थ सेवा करो तो सेवा का मेवा मिलना ही है ।      अव्यक्त स्थिति का अनुभव करने के लिए विशेष होमवर्क आप रूहानी रॉयल आत्मायें हो इसलिए मुख से कभी व्यर्थ वा साधारण बोल न निकलें । हर बोल युक्तियुक्त हो । व्यर्थ भाव से परे अव्यक्त भाव वाला हो तब रॉयल फैमली में आयेंगे। ओम् शांति |

Murli January 23, 2015

Essence: Sweet children, the Father has come to clean your intellects. It is only when you have become clean 
that you will be able to become deities.

Question: What is the predestined plan in this drama from which even the Father cannot become free?
Answer: The Father has to come to His children every cycle. He has to make his impure and unhappy children 
pure and happy again. This plan is predestined in the drama. Even the Father cannot become free from this bondage.

Question: What is the main speciality of the Father who teaches you?
Answer: He is completely egoless and He comes into this impure world and into an impure body. The Father is 
making you into the masters of heaven at this time. Then, from the copper age onwards, you build golden temples 
to Him.

Song: Take us far away from this world of sin to a place of rest and comfort.

Essence for dharna: 

1. You must turn your face away from the great pomp of Maya. Constantly have goose pimples of happiness, knowing 
that you are becoming the most elevated human beings and that God Himself is teaching you. 

2. In order to claim your fortune of the kingdom of the whole world, simply become pure. Just as the Father is 
completely egoless and enters the impure world and an impure body, in the same way, you also have to become as 
egoless as the Father and do service.

Blessing: May you be a special deity and a great soul who garlands with garlands of praise even those who defame you. 

Nowadays, just as when you special souls are garlanded with physical garlands when being welcomed and you put 
those garlands around their necks in return, similarly, garland those who defame you with garlands of praise and they 
will automatically return the garland of praise to you because to garland those who defame you with a garland of praise 
means to guarantee them becoming your devotees for birth after birth. This giving becomes a form of receiving many 
times over. This speciality will make you a specially beloved deity and a great soul.

Slogan: Let the attitude of your mind always be very good and powerful and even those who are bad will become good.